स्वामी विवेकानंद अपने 3 साल के लंबे विदेश प्रवास के बाद 1897 में पानी के जहाज से भारत वापस आते हैं। आम समझ के विपरीत उनके विदेश प्रवास का मुख्य उद्देश्य धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि भारत की गरीब जनता के लिए विकसित पश्चिम से, खासकर ईसाई समुदाय से कुछ आर्थिक मदद लेना था, जैसा कि इस लेख के अंत में बताया जाएगा।
(पहले प्रस्तुत है, अद्वैत आश्रम, मायावती (चंपावत) उत्तराखंड से दस खंडों में छपे विवेकानंद साहित्य के छठे खंड के पेज 10 में एक गौभक्त से स्वामी जी का वार्तालाप)
…” नरेंद्र बाबू (यहां “मिरर” पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ सेन से मुराद है) के चले जाने के पश्चात गोरक्षण सभा के एक उद्यमी प्रचारक स्वामी जी के दर्शनों के लिए आए। वे साधु संन्यासियों का सा वेष धारण किए हुए थे। मस्तक पर गेरूए रंग की एक पगड़ी थी। देखते ही जान पड़ता था कि वह पश्चिमोत्तर अंचल के हैं। इन प्रचारक के आगमन का समाचार पाते ही स्वामी जी कमरे से बाहर आए। प्रचारक ने स्वामी जी का अभिवादन किया और गौ माता का एक चित्र उन्हें दिया। स्वामी जी ने उसे ले लिया और पास बैठे हुए किसी व्यक्ति को देकर प्रचारक से वार्तालाप करने लगे।
स्वामी जी : आप लोगों की सभा का उद्देश्य क्या है?
प्रचारक : हम देश की गौमाताओं को कसाई के हाथों से बचाते हैं। स्थान स्थान पर गौशालाएं स्थापित की गई हैं, जहां रोगग्रस्त, दुर्बल और कसाइयों से मोल ली हुई गउओं का पालन किया जाता है।
स्वामी जी : बड़ी उत्तम बात है। सभा की आय कैसे होती है?
प्रचारक : आप जैसे धर्मात्माओं की कृपा से जो कुछ प्राप्त होता है, उसी से सभा का कार्य चलता है।
स्वामी जी : आपकी जमा पूंजी कितनी है?
प्रचारक : मारवाड़ी वैश्य वर्ग इस कार्य में विशेष सहायता देता है। उन्होंने इस सत्कार्य में बहुत सा धन दिया है।
स्वामी जी : मध्य भारत में इस वर्ष भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा है। भारत सरकार ने घोषित किया है कि 9 लाख लोग अन्न कष्ट से मर गए हैं। क्या आपकी सभा ने इस दुर्भिक्ष में कोई सहायता करने का आयोजन किया है?
प्रचारक : हम दुर्भिक्ष आदि में कुछ सहायता नहीं करते। केवल गौ माता की रक्षा करने के उद्देश्य से ही यह सभा स्थापित हुई है।
स्वामी जी : आपके देखते-देखते इस दुर्भिक्ष में आपके लाखों भाई कराल काल के चंगुल में फंस गए। पास में बहुत सा नगद रुपया होते हुए भी क्या आप लोगों ने एक मुट्ठी अन्न देकर इस भीषण दुर्दिन में उनकी सहायता करना अपना कर्तव्य नहीं समझा?
प्रचारक : नहीं, मनुष्य के पाप कर्म फल से यह दुर्भिक्ष पड़ा था। जैसे कर्म, वैसा फल।
प्रचारक की बात सुनते ही स्वामी जी के क्रोध की ज्वाला भड़क उठी और ऐसा मालूम होने लगा कि उनके नयन प्रांत से अग्निकण स्फुरित हो रहे हैं।
परंतु अपने को संभाल कर उन्होंने कहा,” जो सभा समिति मनुष्यों से सहानुभूति नहीं रखती, अपने भाइयों को बिना अन्न मरते देखकर भी उनकी रक्षा के निमित्त एक मुट्ठी अन्न की सहायता न दे , पर पशु पक्षियों के निमित्त हजारों रुपए व्यय कर रही है, उस सभा समिति से मैं लेश मात्र भी सहानुभूति नहीं रखता। उससे मनुष्य समाज का विशेष कुछ उपकार होगा, इसमें मुझे विश्वास नहीं।
अपने कर्म फल से मनुष्य मरते हैं! इस प्रकार सब बातों में कर्म फल की दुहाई देने से जगत में किसी विषय में कोई भी उद्यम करना व्यर्थ प्रमाणित हो जाएगा। पशु रक्षा का काम भी इसी के अंतर्गत आता है। कहा जा सकता है कि गौ माताएं भी अपने कर्म फल से ही कसाइयों के पास पहुंचती हैं और मारी जाती हैं; अतएव उनकी रक्षा का उद्यम करना भी निष्प्रयोजन ही है।”
प्रचारक ने कुछ झेंप कर कहा — “हां महाराज , आपने जो कहा वह सत्य है, परंतु शास्त्र में लिखा है कि गौ हमारी माता है। ”
स्वामी जी हंसकर बोले — ” जी हां गौ हमारी माता है, यह मैं भली भांति समझता हूं। यदि ऐसा ना होता तो ऐसी कृत-कृत्य संतान और दूसरी कौन प्रसव करती?”
प्रचारक इस विषय पर तो कुछ नहीं बोले। शायद स्वामी जी का व्यंग्य प्रचारक की समझ में नहीं आया। फिर मूल प्रश्न पर लौट कर उन्होंने कहा,” इस समिति की ओर से आपके सम्मुख भिक्षा के लिए उपस्थित हुआ हूं। “
स्वामी जी : मैं ठहरा फकीर आदमी, रुपया मेरे पास कहां है कि मैं आपकी सहायता करूं? परंतु यह भी कहे देता हूं कि यदि कभी मेरे पास धन आए तो मैं उस धन को पहले मनुष्य सेवा में व्यय करूंगा। सबसे पहले मनुष्य की रक्षा आवश्यक है — उन्हें अन्न , धर्म दान, विद्या दान करना पड़ेगा। इन कामों को करके यदि कुछ रुपया बचे तो आपकी समिति को कुछ दूंगा।
इन बातों को सुनकर प्रचारक स्वामी जी को नमस्कार कर चले गए। तब स्वामी जी हमसे कहने लगे,” देखो, कैसे अचंभे की बात उन्होंने बतलाई ! कहा कि मनुष्य अपने कर्म फल से मरता है, उस पर दया करने से क्या होगा? हमारे देश के पतन का अनुमान इसी बात से किया किया जा सकता है। तुम्हारे धर्म का कर्मवाद कहां जाकर पहुंचा है ! जिस मनुष्य का मनुष्य के लिए जी नहीं दुखता वह अपने को मनुष्य कैसे कहता है?” इन बातों को कहने के साथ ही स्वामी जी का शरीर क्षोभ और दुःख से तिलमिला उठा।
(यहां वह प्रसंग समाप्त हो जाता है)
प्रसंगवश बता दिया जाए कि 10 अगस्त को ही हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई की पुण्यतिथि थी। ऐसे पाखंडी लोगों पर ही जिनकी एक प्रसिद्ध व्यंग्य रचना है,”एक गौ भक्त से भेंट”, जो तकरीबन स्वामी विवेकानंद के उपरोक्त प्रसंग से बहुत साम्य रखती है।
1925 में अपने जन्म के बाद, पूरे बाइस सालों तक आजादी की लड़ाई से किसी छूत की बीमारी की तरह दूर रहे, अंग्रेजों के अनन्य भक्त अर्धगुप्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सैकड़ों नव फासीवादी संगठनों में स्वामी विवेकानंद की तस्वीर का कतई अनधिकृत इस्तेमाल किया जाता है, केवल विवेकानंद की मूर्ति पूजा की जाती है।
लेकिन समाजवाद की भविष्यवाणी करने वाले स्वामी विवेकानंद अगर किसी से जुड़े हैं तो वह हैं वो वामपंथी संगठन जो मज़दूरों, छोटे किसानों, आदिवासी समुदायों, गरीबों की लड़ाइयां लड़ रहे हैं। इतिहास में दर्ज है कि स्वामी विवेकानंद से उनके समय के तमाम विश्व स्तर के वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, कलाकार, साहित्यकार मिलते थे और उनके संभाषणों को जरूर सुनते थे। स्वामी विवेकानंद के लेखक भाषणों में प्रकृति की द्वंदात्मकता को भी जगह-जगह स्वीकार किया गया है।
यहां तक कि उनका मानना था कि अगर वैज्ञानिक किसी सत्य को प्रमाणित करते हैं तो वह उसे जरूर स्वीकार कर लेंगे। वे बड़ी दिलचस्पी से वैज्ञानिकों से बात करते थे। सिस्टर निवेदिता , उनकी आयरिश विदेशी शिष्या, जो उनके साथ ही (कलकत्ता) भारत आई और आजन्म यहीं रही, कोलकाता के प्रवास में रोगियों की सेवा करते हुए खुद भी रोग ग्रस्त हो गई और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई।
उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बंगाल में उन दिनों सक्रिय एक हथियार बंद संगठन ( अनुशीलन या युगांतर) से जुड़ाव किया लेकिन अपने गुरु स्वामी विवेकानंद के सख्त निर्देशों कि रामकृष्ण मिशन कभी राजनीति में नहीं आएगा, उन्होंने औपचारिक रूप से आश्रम से त्यागपत्र दिया और स्वामी जी के भाई से जुड़ कर देश भक्ति हेतु काम किया।
हालांकि वो पहले ही की तरह गुरु भाइयों और आश्रम से जुड़ी रही, भारत की बुराई वो सह नहीं पाती थीं।
उन्होंने दुनिया के जाने माने सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जे सी बोस को, जिनसे आयु में छोटी होते हुए भी वह उन्हें अपने पुत्र के समान मानती थी, अपने आयरिश मूल के प्रभाव होने के कारण बहुत आर्थिक मदद दी। और उनकी खोजों को भेदभाव करने वाले उच्च अंग्रेज अधिकारियों से लड़ भिड़ कर प्रकाशित करवाया।
विवेकानंद साहित्य के 10 खंडों का प्रकाशन स्वामी विवेकानंद जन्मशती के अवसर पर (उनके साथ ही भारत आए अंग्रेज शिष्य महात्मा कैप्टन सेवियर दंपति द्वारा उत्तराखंड में निर्मित) अद्वैत आश्रम द्वारा करवाया गया था। प्रथम खंड की भूमिका में दर्ज है कि इन 10 खंडों का प्रकाशन तत्कालीन केंद्रीय सरकार, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की सरकारों की सहायता से हुआ। परंतु व्यय का अधिकांश अद्वैत आश्रम को ही वहन करना पड़ा था।
हिंदी अनुवाद के लिए पंडित सुमित्रानंदन पंत और निराला जी ने भी बहुत काम किया। इसमें कहीं भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या ऐसे किसी भी हिंदू संगठन के किसी भी प्रकार के सहयोग का जिक्र नहीं है। क्या 1963 में 38 साल पूरे कर चुका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या तब देश में दर्जनों सीटें जीत चुकी जनसंघ पार्टी या ऐसा ही कोई संगठन इसमें सहयोग नहीं दे सकता था? स्वामी विवेकानंद साहित्य हिंदी, अंग्रेजी के साथ बांग्ला, ओड़िया, तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी और गुजराती में भी प्रकाशित किया गया था।
फिलहाल धर्म महासभा में शिकागो में 11 सितंबर, 1893 को दिए गए पहले भाषण के कुछ अंश निम्नवत हैं।
(वैसे उसके बाद भी सितंबर माह में ही विवेकानंद कई भाषण धर्म सभा में देते हैं)
तो पेश है, पहले भाषण के कुछ अंश :
” अमेरिकावासी बहनों तथा भाइयों !…
…मैं ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन समस्त धर्मो को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं।…
… सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मांधता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है। वह पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं , उसको बारंबार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं ।…
…पर अब उनका समय आ गया है, और मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूं कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटा ध्वनि हुई है, वह समस्त धर्मांधता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।
(पहला भाषण समाप्त)
अब 15 सितंबर का भाषण देखिए :
” यही कठिनाई सदैव रही है। मैं हिंदू हूं। मैं अपने क्षुद्र कुएं में बैठा यही समझता हूं कि मेरा कुआं ही संपूर्ण संसार है। ईसाई भी अपने क्षुद्र कुएं में बैठे हुए यही समझता है कि सारा संसार उसी के कुएं में है और मुसलमान भी अपने क्षुद्र कुएं में बैठा हुआ उसी को सारा ब्रह्मांड मानता है। मैं आप अमेरिका वालों को धन्य कहता हूं क्योंकि आप हम लोगों के इन छोटे-छोटे संसारों की क्षुद्र सीमाओं को तोड़ने का महान प्रयत्न कर रहे हैं और मैं आशा करता हूं कि भविष्य में परमात्मा आपके इस उद्योग में सहायता देकर आपका मनोरथ पूर्ण करेंगे।
( भाषण समाप्त)
इसके बाद 19 सितंबर को एक और भाषण होता है।
फिर 20 सितंबर का भाषण खंड एक के पेज नंबर 22 में कतई इस प्रकार दर्ज है।
(शीर्षक) धर्म : भारत की प्रधान आवश्यकता नहीं
“ईसाइयों को सत आलोचना सुनने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए और मुझे विश्वास है कि यदि मैं आप लोगों की कुछ आलोचना करूं तो आप बुरा ना मानेंगे। आप ईसाई लोग जो मूर्तिपूजकों की आत्मा का उद्धार करने के निमित्त अपने धर्म प्रचारकों को भेजने के लिए इतने उत्सुक रहते हैं, उनके शरीरों को भूख से मर जाने से बचने के लिए कुछ क्यों नहीं करते? भारतवर्ष में जब भयानक अकाल पड़ा था तो सहस्त्रों और लाखों हिंदू भूख से पीड़ित होकर मर गए; पर आप ईसाइयों ने उनके लिए कुछ नहीं किया।
आप लोग सारे हिंदुस्तान में गिरजे बनाते हैं; पर पूर्व का प्रधान अभाव धर्म नहीं है, उनके पास धर्म पर्याप्त है — जलते हुए हिंदुस्तान के लाखों दुखी भूखे लोग सूखे गले से रोटी के लिए चिल्ला रहे हैं। वह हमसे रोटी मांगते हैं, और हम उन्हें देते हैं पत्थर! भूखों को धर्म का उपदेश देना उनका अपमान करना है, भूखों को दर्शन सिखाना उनका अपमान करना है। भारतवर्ष में यदि कोई पुरोहित द्रव्य प्राप्ति के लिए धर्म का उपदेश करे तो वह जाति से च्युत कर दिया जाएगा और लोग उस पर थूकेंगे।
मैं यहां पर अपने दरिद्र भाइयों के निमित्त सहायता मांगने आया था, पर मैं यह पूरी तरह समझ गया हूं की मूर्तीपूजकों के लिए ईसाई धर्मावलंबियों से और विशेषकर उन्हीं के देश में सहायता प्राप्त करना कितना कठिन है। “
( भाषण समाप्त)
पाठक समझ गए होंगे कि स्वामी विवेकानंद की विचारधारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की विचारधारा का कहीं कोई मेल नहीं है। है क्या ??..!! मेरे पास रामकृष्ण मिशन का ही एक पोस्टर रखा है जहां जिसमें स्वामी विवेकानंद की तस्वीर के नीचे उनका विचार अंकित है:
” मैं उस प्रभु का सेवक हूं, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य रहते हैं।”
यह वही (आजकल के जमाने में दुर्लभ क्या असंभव) विवेकानंद हैं जो शिकागो में एक अमीर अमेरिकन आदमी के घर में रात को आरामदायक बिस्तर पर लेटे हुए थे कि अचानक उतर कर जमीन पर लेट जाते हैं। और बालकों की तरह रोने लगते हैं कि मैं यहां आराम से सोया हूं और मेरे देश में लोग भूखे वंचित गुलाम हैं।
भाजपा आदि के ये पाखंडी लोग स्वामी विवेकानंद से 100 अरब प्रकाश वर्ष दूर हैं।
(और आत्मिक, काव्यात्मक रूप से देखा जाए तो, नागपुर के बजबजाते नर्क कुंड से लगभग इतना ही दूर सौ साल पहले बना रामकृष्ण मिशन, नागपुर का आश्रम भी है। अनपढ़ भोले भाले बालवत सरल रामकृष्ण परमहंस!!.. जिन्होंने स्वयं इस्लाम, ईसाई धर्मों की साधनाएं की थीं, कहा था कि सब अपनी ही घड़ी को सही बताते हैं, और जिनके शब्द ही थे जो उनके अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त योग्य शिष्य स्वामी विवेकानंद के हृदय से शिकागो धर्म महासभा में गूंजे थे)।
(डॉ उमेश चंदोला का लेख)